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निरमा: गुजरात भारत का वो राज्य है जो हमेशा से व्यापार के लिए प्रसिद्ध रहा है. गुजरात में हमेशा देखा गया है कि यहाँ लोगों को व्यापार करने के लिए सोच ज्यादा जरूरी होती है ना कि पैसा। गुजरात के सारे व्यापारियों में आपको एक खास बात देखने को हमेशा मिलेगी कि वह व्यापार में आने से पहले कभी भी पैसा के बारे में नहीं सोचते है। वो बस हर हाल में अपने सोच को सच करने में जुड़ जाते हैं भले ही उसके लिए कोई छोटी मोटी नौकरी करने पड़े या फिर घर घर जा कर अपना समान बेचना पड़े, इन सबमे वे कभी संकोच नहीं करते है।

आज हम आप सबके साथ एक ऐसे ही गुजरात के व्यापारी की कहानी लाये है जिन्होंने अपने सोच को सच करने के लिए सरकारी नौकरी छोड़ कर घर घर जाकर अपना प्रोडक्ट बेचना चालू किया और आज देखते ही देखते देश के सबसे धनी लोगों में शामिल हो चुके है

खुद ही करते थे निर्माण और बेचते भी खुद ही थे

हम आज निरमा कंपनी के मालिक करसनभाई पटेल की बात करने वाले है। बता दे करसनभाई पटेल कंपनी शुरू करने से पहले अपने ही घर के पीछे डिटर्जेंट पाउडर बनाते थे । उनके द्वारा वाशिंग पाउडर तैयार हो जाने के बाद वो उस वाशिंग पाउडर को घर घर ले जाकर बेचते थे। साथ ही वह लोगों को ये गारंटी भी देते थे कि अगर वाशिंग पाउडर सही नहीं हुआ तो पैसा वापस कर देंगे। इसके साथ साथ उस समय उनका डिटर्जेंट का दाम अन्य डिटर्जेंट के मुकाबले काफी सस्ता था, जहाँ अन्य डिटर्जेंट का दाम प्रति किलो 13 रुपया था तो वहीं निरमा का दाम मात्र 3 रुपया था। इन सारे कारणों से वह आसानी से मध्यमवर्गीय तथा निम्न मध्यमवर्गीय परिवारों में अपनी जगह बनाने में कामयाब रहे।

एक व्यक्ति द्वारा चालू किये गये कंपनी में आज 18,000 लोग काम करते हैं।

अकेले करसन भाई पटेल द्वारा चालू किये गये निरमा कंपनी में आज लगभग 18,000 लोग काम करते हैं। आज निरमा भारत की सबसे प्रसिद्ध ब्रांड में से एक है। आज कंपनी का टर्नओवर 70,000 करोड़ से भी ज्यादा है।

किसान परिवार से रखते थे ताल्लुक

Dr. Karsan Bhai Patel

करसनभाई पटेल का जन्म 1944 में गुजरात के एक किसान परिवार में हुआ था। उनके पिता खोड़ीदास पटेल एक बेहद साधारण इंसान थे लेकिन इसके वावजूद उन्होंने अपने बेटे को काफी अच्छी शिक्षा दी। करसनभाई पटेल ने अपनी शुरुआती शिक्षा अपने जन्म स्थल मेहसाणा के ही स्थानीय स्कूल से पूरी की। उन्होंने रसायन शास्त्र से अपनी बी. एस. सी की पढाई पूरी की। वैसे तो अधिकतर गुजरतियों की तरह करसन भाई भी व्यवसाय करना चाहते थे पर घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने के कारण वह खुद के दम पर कोई नया काम शुरू नहीं कर पाए। पढाई पूरा करने के बाद उन्होंने एक प्रयोगशाला में सहायक यानी लैब असिस्टेंट की नौकरी कर ली। कुछ समय तक लैब में काम करने के बाद उन्हें गुजरात सरकार में प्रयोगशाला में सहायक यानी लैब असिस्टेंट की नौकरी कर ली।

एक हादसा जिसने बदल दी जिंदगी

एक आदमी की नजारिया सी देखें तो करसन भाई की ज़िंदगी अच्छी कट रही थी। एक सरकारी नौकरी और अपने परिवार के साथ उन्हें खुश रहना चाहिए था। वह अपने जीवन में खुश तो थे पर संतुष्ट नहीं थे, कुछ अपना और कुछ नया करने के लिए इच्छा उनके दिल में लगातार मचल रही थी. पर वह हमेशा किसी तरह अपने इच्छा को मार कर नौकरी करते रहे। करसन भाई अपनी बेटी से बहुत प्यार करते थे, वह हमेशा चाहते थे कि उनकी बेटी पढ़ लिखकर कुछ ऐसा करे जिससे उसे पूरा देश जाने। ऐसा शायद संभव भी हो पता अगर उनकी बेटी आज जीवित होती।

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जब उनकी बेटी स्कूल में पढ़ती थी तब एक हादसा में उसकी मौत हो गयी। इस हादसा ने करसन भाई को अंदर से तोड़ दिया, लेकिन कुछ समय बाद उनका जीवन फिर से पटरी पर लौटा। साथ ही करसन भाई ने इस हादसा के बाद से अपने जीवन में एक नई राह भी चुनी।

एक सुबह करसन भाई एक नई सोच के साथ जागे। उनको उस समय एक ऐसा उपाय सुझा था जिससे कि वह अपने बेटी को फिर से अपने जीवन का हिस्सा बना सकते थे, साथ ही उसे लेकर देखा हुआ सपना भी पूरा कर सकते थे। इसलिए उन्होंने वाशिंग पाउडर बना कर बेचने का निर्णय लिया। करसन पटेल की बेटी का नाम निरुपमा था और प्यार से सब उसे निरमा कहते थे, इसलिए अपने इस Product का नाम उन्होंने ‘निरमा’ रखा जिससे कि उनकी बेटी इस नाम के साथ हमेशा ज़िंदा रहे।

कुछ इस तरह से हुई निरमा कंपनी की शुरुआत

साल 1969 में करसन भाई ने अपने घर के पीछे वाशिंग पाउडर बनाना शुरू किया. वह काफी पढ़े लिखे थे और उन्होंने साइंस में ग्रेजुएट किया हुआ था इसलिए यह काम उनके लिए थोड़ा भी कठिन नहीं था। लगातार कोशिश करने के बाद उन्होंने सोडा ऐश के साथ कुछ अन्य समग्रियां मिला कर वशिंग पाउडर बनाने की कोशिश शुरू की और एक दिन उन्हें पीले रंग के पाउडर के रूप में उनको एक फार्मूला मिल गया। जिस समय उन्होंने वाशिंग पाउडर का निर्माण चालू किया उस समय भारत में लोगों के पास वाशिंग पाउडर को लेकर ज्यादा विकल्प नहीं थे। उस समय केवल हिंदुस्तान लीवर या फिर विदेशी कंपनियां सर्फ़ बेचती थीं, लेकिन इनके दाम इतने ज्यादा थे कि मध्यमवर्गीय और निम्न मध्यवर्गीय परिवार इसे अपने बजट में शामिल नहीं कर पाते थे। इसलिए उस समय लोग साबुन का इस्तमाल करते थे जिससे हमेशा हाथ खराब होने का डर रहता था। इसलिए ये मौका करसन भाई के लिए सुनहरा था और इस सुनहरे मौका को भुनाने के लिए उन्होंने कोई कमी भी नहीं छोड़ी।

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करसन भाई अपने काम से लौटने के बाद घर घर में जाकर अपना प्रोडक्ट बेचते थे। उन्होंने इसकी शुरुआत अपने पड़ोस के घरों से किया। उनसे अच्छा प्रतिक्रिया मिलने के बाद उन्होंने एक साइकिल लेकर घर घर जाकर अपना निरमा डिटर्जेंट बेचना चालू कर दिया। उस समय अन्य ब्रैंड के डिटर्जेंट का दाम जहाँ 13 से 30 रुपया हुआ करता था उसी समय करसन भाई मात्र 3 रुपए किलो में लोगों को निरमा दे देते थे। निरमा की अच्छी क्वालिटी और इसके कम दाम ने अपना जादू दिखाया और देखते ही देखते ये सर्फ मध्यवर्गीय से लेकर निम्न मध्यवर्गीय परिवारों तक की पहली पसंद बन गया।

प्रोडक्ट पर भरोसा करके छोड़ा सरकारी नौकरी

करसन भाई ने जब देखा कि उनका प्रोडक्ट लोगों के बीच जगह बनानी में सफल हो रही है तब उन्होंने इस व्यवसाय को बढ़ाने का सोचा पर इन सबके बीच उनका नौकरी रोड़ा बन रहा था। वह अपने नौकरी के कारण इसमें ज्यादा ध्यान नहीं दे पा रहे थे। एक जमी जमाई सरकारी नौकरी को छोड़ना किसी के लिए भी जोखिम भरा कदम था लेकिन करसन भाई को अपने प्रोडक्ट निरमा पर विश्वास था और उन्होंने फैसला किया कि वह सरकारी नौकरी छोड़ कर सारा समय अपने व्यवसाय को देंगे।

शुरू किया विज्ञापन सबकी पसंद निरमा

करसन भाई के लिए आगे एक बड़ी चुनौती थी कि किस तरह वह अपने प्रोडक्ट निरमा को पूरे देश की जनता तक पहुंचाएं। इसको संभव बनाने के लिए करसन भाई ने विज्ञापन और असरदार जिंगल का सहारा लिया। निरमा ब्रैंड को देश भर में प्रसिद्धि दिलाने में ‘सबकी पसंद निरमा’ जैसे टेलीविजन विज्ञापन का सबसे बड़ा हाथ रहा। ये विज्ञापन देश में कुछ इस तरीके से फैला कि इस विज्ञापन के बाद निरमा खरीदने के लिए स्थानीय बाजारों में ग्राहकों की भीड़ लगने लगी।

करसन भाई ने खेला एक मास्टर स्टॉक

जब निरमा का मार्केट में मांग बढ़ रहा था तब करसन भाई ने प्रोडक्ट की सप्लाई मार्केट में बढ़ाने की वजह उन्होंने चालाकी दिखाते हुए 90% स्टॉक वापस ले लिए। उनके द्वारा लिया गया ये कदम आगे जाकर एक मास्टर स्ट्रोक साबित हुआ। लोगों को एक महीने तक निरमा को टीवी विज्ञापन में ही देख पाए क्योंकि जब वह बाजार से इसे खरीदने जाते तो उन्हें कहीं भी ये ना मिलता था। एक महीने बाद जब खुदरा विक्रेताओं ने निरमा का आपूर्ति के लिए करसन भाई से अनुरोध किया तब उसे बाजार में लाया गया। इस देरी से निरमा कंपनी को ये फायदा हुआ कि वाशिंग पाउडर की मांग बढ़ने के कारण बाजार में आते ही निरमा ने बड़े अंतर से सर्फ के अन्य ब्रांड्स को पीछे छोड़ दिया। उस वर्ष निरमा भारत में सबसे ज्यादा बिक्री होने वाला वाशिंग पाउडर था। निरमा उस समय इतना कामयाब हुआ कि अगले एक दशक तक इसने किसी अन्य ब्रांड को अपने आसपास भी नहीं भटकने दिया।

निरमा नाम से यूनिवर्सिटी की स्थापना

करसन भाई ने साल 1995 निरमा नाम को एक अलग पहचान दी जब उन्होंने अहमदाबाद में निरमा इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी की स्थापना की। निरमा इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में मिली सफलता के बाद करसन भाई ने साल 2003 में और दो निरमा इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट और निरमा यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी की स्थापना भी की।

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अमेरिका विज्ञापन कंपनी फोर्ब्स ने जानकारी दिया कि एक साल में निरमा पाउडर की सेल आठ लाख टन है। साल 2005 में फोर्ब्स के अनुसार करसन पटेल की कुल संपत्ति 640 मिलियन डॉलर थी जो जल्द ही 1000 मिलियन डॉलर को छूने वाली थी। आज करसन भाई की संपति 4.1 बिलियन है । करसन भाई आज दुनिया के बिलिनीयर्स की सूची में 775वें तथा भारत के सबसे धनी लोगों की सूची में 39वें स्थान पर हैं । इन सबको छोड़कर उन्होंने सबसे बड़ी कामयाबी ये हासिल किया कि आज पूरे दुनिया में अपनी बेटी निरमा का नाम प्रसिद्ध कर दिया। आज निरमा को हर कोई जानता है।

2 thoughts on “निरमा: बेटी की याद में पिता ने खड़ा किया सबसे बड़ी कम्पनी”

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